महात्मा गाँधी भारत में देश की स्वतंत्रता के लिए चलाये गए आंदोलन से पहले 21 सालों तक साउथ अफ्रीका में रहे। गांधीजी ने वहां पर सत्याग्रह को जन्म दिया। भारतीय और अफ़्रीकी अश्वेतों के खिलाफ हो रहे भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी। महात्मा गाँधी 1893 में साउथ अफ्रीका पहुंचे। वहां पहुँचते ही उन्हें श्वेतों द्वारा भारतियों पर हो रहे अत्याचारों का सामना करना पड़ा। कुछ ही समय में गांधीजी दक्षिण अफ्रीकी भारतीय समुदाय के नेता बन गए दक्षिण अफ्रीका में अहिंसक आंदोलन में उनकी भागीदारी ने ऐसा प्रभाव डाला था कि अब भी उन्हें वहां एक नेता के रूप में देखा जाता है। 1893 से 1914 तक, गांधी ने एक वकील और एक सार्वजनिक कार्यकर्ता के रूप में काम किया।
वे 9 काम जो महात्मा गाँधी ने साउथ अफ्रीका में रहते हुए किये थे :
- जब वे प्रिटोरिया के लिए ट्रेन से यात्रा कर रहे थे, तब उन्हें प्रथम श्रेणी का टिकट ले जाने के बावजूद, अधिकारियों द्वारा ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। प्रथम श्रेणी का पूरा डब्बा श्वेतों के लिए आरक्षित होता था इसमें अश्वेत नहीं बैठ सकते थे।
- इसके जवाब में गांधीजी ने 1894 में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की। इस संगठन ने मूल अफ्रीकी और भारतीयों के प्रति गोरे लोगों के बुरे व्यवहार के खिलाफ अहिंसक विरोध का नेतृत्व किया।
- 1896 में, वे थोड़े समय के लिए भारत आए और दक्षिण अफ्रीका में उनके साथ सेवा करने के लिए 800 भारतीयों को इकट्ठा किया। जब वे साउथ अफ्रीका पहुंचे थे गुस्से भीड़ ने उन पर हमला कर दिया था जिसमे वो घायल हो गए थे।
- 1899 में हुए बोअर युद्ध में घायल सैनिकों की सेवा के लिए इंडियन एम्बुलेंस कॉर्प का गठन किया। इसके साथ साथ युद्ध में घायल हुए जुलु समुदाय के निर्दोष लोगों (जिन्हे अछूता माना जाता था) का भी उपचार किया।
- भारतियों के आवाज के लिए 1903 में उन्होंने इंडियन ओपिनियन नामक अखवार शुरू किया। इसको गुजरती भाषा में भी छापा जाता था।
- इंग्लिश लेखक जॉन रस्किन की किताब अन्टू डी लास्ट (unto the last) से प्रेरित होकर डरबन के समीप फीनिक्स फार्म स्थापित किया। इसके बाद टॉलस्टॉय फार्म की भी स्थापना की थी।
- सितंबर 1906 में, गांधी ने स्थानीय भारतीयों के खिलाफ गठित ट्रांसवाल एशियाई अध्यादेश के विरोध में पहला सत्याग्रह अभियान चलाया। जून 1907 में फिर से उन्होंने काले अधिनियम के खिलाफ सत्याग्रह किया।
- गांधी ने भारतीय नाबालिगों के उत्पीड़न के खिलाफ ट्रांसवाल में एक और शांतिपूर्ण प्रतिरोध अभियान का आयोजन किया। उन्होंने ट्रांसवाल सीमा के पार लगभग 2,000 भारतीयों का नेतृत्व किया।
उन्होंने 1913 में गैर-ईसाई विवाहों को रद्द करने के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी।

गांधीजी में दूसरों के प्रति सम्मान की भावना ही उनके लिए प्रेरणाा बनी।
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